फिर धीरे-धीरे उठे और अपने नेत्रोंके आँसू पोंछे। प्रेम और मुक्तिके एकमात्र उद्गम भगवान्को देखकर उनका सिर झुक गया। वे काँपने लगे। अंजलि बाँधकर बड़ी नम्रता और एकाग्रताके साथ गद्गद वाणीसे वे भगवान्की स्तुति करने लगे॥ ६४॥
शनैरथोत्थाय विमृज्य लोचने
मुकुन्दमुद्वीक्ष्य विनम्रकन्धरः।
कृतांजलिः प्रश्रयवान् समाहितः
सवेपथुर्गद्गदयैलतेलया ॥ ६४
फिर धीरे-धीरे उठे और अपने नेत्रोंके आँसू पोंछे। प्रेम और मुक्तिके एकमात्र उद्गम भगवान्को देखकर उनका सिर झुक गया। वे काँपने लगे। अंजलि बाँधकर बड़ी नम्रता और एकाग्रताके साथ गद्गद वाणीसे वे भगवान्की स्तुति करने लगे॥ ६४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.13.64 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 220) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/13/64/