श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.63

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

उत्थायोत्थाय कृष्णस्य चिरस्य पादयोः पतन्।

आस्ते महित्वं प्राग्दृष्टं स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः पुनः॥ ६३

utthāyotthāya kṛṣṇasya cirasya pādayoḥ patan|

āste mahitvaṃ prāgdṛṣṭaṃ smṛtvā smṛtvā punaḥ punaḥ|| 63

अर्थ

वे भगवान् श्रीकृष्णकी पहले देखी हुई महिमाका बार-बार स्मरण करते, उनके चरणोंपर गिरते और उठ-उठकर फिर-फिर गिर पड़ते। इसी प्रकार बहुत देरतक वे भगवान्‌के चरणोंमें ही पड़े रहे॥ ६३॥✎ 1662

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1662 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आनन्द-स्वरूप → आनन्दस्वरूप

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