श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.60

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

यत्र नैसर्गदुर्वैराः सहासन् नृमृगादयः।

मित्राणीवाजितावासद्रुतरुट्तर्षकादिकम् ॥ ६०

yatra naisargadurvairāḥ sahāsan nṛmṛgādayaḥ|

mitrāṇīvājitāvāsadrutaruṭtarṣakādikam || 60

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाभूमि होनेके कारण वृन्दावनधाममें क्रोध, तृष्णा आदि दोष प्रवेश नहीं कर सकते और वहाँ स्वभावसे ही परस्पर दुस्त्यज वैर रखनेवाले मनुष्य और पशु-पक्षी भी प्रेमी मित्रोंके समान हिल-मिलकर एक साथ रहते हैं॥ ६०॥✎ 1662

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1662 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आनन्द-स्वरूप → आनन्दस्वरूप

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