श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.59

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

सपद्येवाभितः पश्यन् दिशोऽपश्यत् पुरः स्थितम्।

वृन्दावनं जनाजीव्यद्रुमाकीर्णं समाप्रियम्॥ ५९

sapadyevābhitaḥ paśyan diśo'paśyat puraḥ sthitam|

vṛndāvanaṃ janājīvyadrumākīrṇaṃ samāpriyam|| 59

अर्थ

फिर ब्रह्माजी जब चारों ओर देखने लगे, तब पहले दिशाएँ और उसके बाद तुरंत ही उनके सामने वृन्दावन दिखायी पड़ा। वृन्दावन सबके लिये एक-सा प्यारा है। जिधर देखिये, उधर ही जीवोंको जीवन देनेवाले फल और फूलोंसे लदे हुए, हरे-हरे पत्तोंसे लहलहाते हुए वृक्षोंकी पाँतें शोभा पा रही हैं॥ ५९॥✎ 1662

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1662 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आनन्द-स्वरूप → आनन्दस्वरूप

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