श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.56

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

ततोऽतिकुतुकोद‍्वृत्तस्तिमितैकादशेन्द्रियः।

तद्धाम्‍नाभूदजस्तूष्णीं पूर्देव्यन्तीव पुत्रिका॥ ५६

tato'tikutukodvṛttastimitaikādaśendriyaḥ|

taddhāmnābhūdajastūṣṇīṃ pūrdevyantīva putrikā|| 56

अर्थ

यह अत्यन्त आश्‍चर्यमय दृश्य देखकर ब्रह्माजी तो चकित रह गये। उनकी ग्यारहों इन्द्रियाँ (पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय और एक मन) क्षुब्ध एवं स्तब्ध रह गयीं। वे भगवान्‌के तेजसे निस्तेज होकर मौन हो गये। उस समय वे ऐसे स्तब्ध होकर खड़े रह गये, मानो व्रजके अधिष्ठातृ-देवताके पास एक पुतली खड़ी हो॥ ५६॥✎ 1662

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1662 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आनन्द-स्वरूप → आनन्दस्वरूप

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