श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

अहोऽतिरम्यं पुलिनं वयस्याः

स्वकेलिसम्पन्मृदुलाच्छवालुकम्।

स्फुटत्सरोगन्धहृतालिपत्रिक-

ध्वनिप्रतिध्वानलसद‍्द्रुमाकुलम् ॥ ५

aho'tiramyaṃ pulinaṃ vayasyāḥ

svakelisampanmṛdulācchavālukam|

sphuṭatsarogandhahṛtālipatrika-

dhvanipratidhvānalasaddrumākulam || 5

अर्थ

‘मेरे प्यारे मित्रो! यमुनाजीका यह पुलिन अत्यन्त रमणीय है। देखो तो सही, यहाँकी बालू कितनी कोमल और स्वच्छ है। हमलोगोंके लिये खेलनेकी तो यहाँ सभी सामग्री विद्यमान है। देखो, एक ओर रंग-बिरंगे कमल खिले हुए हैं और उनकी सुगन्धसे खिंचकर भौंरे गुंजार कर रहे हैं; तो दूसरी ओर सुन्दर-सुन्दर पक्षी बड़ा ही मधुर कलरव कर रहे हैं, जिसकी प्रतिध्वनिसे सुशोभित वृक्ष इस स्थानकी शोभा बढ़ा रहे हैं॥ ५॥✎ 2066

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2066 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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