अपने-अपने बालकोंके प्रति व्रजवासियोंकी स्नेह-लता दिन-प्रतिदिन एक वर्षतक धीरे-धीरे बढ़ती ही गयी। यहाँतक कि पहले श्रीकृष्णमें उनका जैसा असीम और अपूर्व प्रेम था, वैसा ही अपने इन बालकोंके प्रति भी हो गया॥ २६॥✎ 1927
व्रजौकसां स्वतोकेषु स्नेहवल्ल्याब्दमन्वहम्।
शनैर्निःसीम ववृधे यथा कृष्णे त्वपूर्ववत्॥ २६
अपने-अपने बालकोंके प्रति व्रजवासियोंकी स्नेह-लता दिन-प्रतिदिन एक वर्षतक धीरे-धीरे बढ़ती ही गयी। यहाँतक कि पहले श्रीकृष्णमें उनका जैसा असीम और अपूर्व प्रेम था, वैसा ही अपने इन बालकोंके प्रति भी हो गया॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.13.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 214) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/13/26/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1927 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): व्रज-वासियोंकी → व्रजवासियोंकी