श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

गोगोपीनां मातृतास्मिन् सर्वा स्नेहर्द्धिकां विना।

पुरोवदास्वपि हरेस्तोकता मायया विना॥ २५

gogopīnāṃ mātṛtāsmin sarvā sneharddhikāṃ vinā|

purovadāsvapi harestokatā māyayā vinā|| 25

अर्थ

इन गायों और ग्वालिनोंका मातृभाव पहले-जैसा ही ऐश्‍वर्यज्ञानरहित और विशुद्ध था। हाँ, अपने असली पुत्रोंकी अपेक्षा इस समय उनका स्नेह अवश्य अधिक था। इसी प्रकार भगवान् भी उनके पहले पुत्रोंके समान ही पुत्रभाव दिखला रहे थे, परन्तु भगवान्‌में उन बालकोंके जैसा मोहका भाव नहीं था कि मैं इनका पुत्र हूँ॥ २५॥✎ 1927

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1927 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): व्रज-वासियोंकी → व्रजवासियोंकी

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें