श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

सूत उवाच

इत्थं द्विजा यादवदेवदत्तः

श्रुत्वा स्वरातुश्‍चरितं विचित्रम्।

पप्रच्छ भूयोऽपि तदेव पुण्यं

वैयासकिं यन्‍निगृहीतचेताः॥ ४०

itthaṃ dvijā yādavadevadattaḥ

śrutvā svarātuścaritaṃ vicitram|

papraccha bhūyo'pi tadeva puṇyaṃ

vaiyāsakiṃ yannigṛhītacetāḥ|| 40

अर्थ

सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! यदुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने ही राजा परीक्षित‍्को जीवन दान दिया था । उन्होंने जब अपने रक्षक एवं जीवनसर्वस्वका यह विचित्र चरित्र सुना, तब उन्होंने फिर श्रीशुकदेवजी महाराजसे उन्हींकी पवित्र लीलाके सम्बन्धमें प्रश्‍न किया। इसका कारण यह था कि भगवान्‌की अमृतमयी लीलाने परीक्षित‍्के चित्तको अपने वशमें कर रखा था॥ ४०॥✎ 1416

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1416 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पराक्षित‍्को → परीक्षित‍्को

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