॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.12.34
ततोऽतिहृष्टाः स्वकृतोऽकृतार्हणं
पुष्पैः सुरा अप्सरसश्च नर्तनैः।
गीतैः सुगा वाद्यधराश्च वाद्यकैः
स्तवैश्च विप्रा जयनिःस्वनैर्गणाः॥ ३४
tato'tihṛṣṭāḥ svakṛto'kṛtārhaṇaṃ
puṣpaiḥ surā apsarasaśca nartanaiḥ|
gītaiḥ sugā vādyadharāśca vādyakaiḥ
stavaiśca viprā jayaniḥsvanairgaṇāḥ|| 34
अर्थ
उस समय देवताओंने फूल बरसाकर, अप्सराओंने नाचकर, गन्धर्वोंने गाकर, विद्याधरोंने बाजे बजाकर, ब्राह्मणोंने स्तुति-पाठकर और पार्षदोंने जय-जय-कारके नारे लगाकर बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णका अभिनन्दन किया। क्योंकि भगवान् श्रीकृष्णने अघासुरको मारकर उन सबका बहुत बड़ा काम किया था॥ ३४॥✎ 1659