श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

ततोऽतिहृष्टाः स्वकृतोऽकृतार्हणं

पुष्पैः सुरा अप्सरसश्‍च नर्तनैः।

गीतैः सुगा वाद्यधराश्‍च वाद्यकैः

स्तवैश्‍च विप्रा जयनिःस्वनैर्गणाः॥ ३४

tato'tihṛṣṭāḥ svakṛto'kṛtārhaṇaṃ

puṣpaiḥ surā apsarasaśca nartanaiḥ|

gītaiḥ sugā vādyadharāśca vādyakaiḥ

stavaiśca viprā jayaniḥsvanairgaṇāḥ|| 34

अर्थ

उस समय देवताओंने फूल बरसाकर, अप्सराओंने नाचकर, गन्धर्वोंने गाकर, विद्याधरोंने बाजे बजाकर, ब्राह्मणोंने स्तुति-पाठकर और पार्षदोंने जय-जय-कारके नारे लगाकर बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णका अभिनन्दन किया। क्योंकि भगवान् श्रीकृष्णने अघासुरको मारकर उन सबका बहुत बड़ा काम किया था॥ ३४॥✎ 1659

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1659 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ब्रह्म-लोकके → ब्रह्मलोकके

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें