श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

पीनाहिभोगोत्थितमद्भुतं मह-

ज्ज्योतिः स्वधाम्‍ना ज्वलयद् दिशो दश।

प्रतीक्ष्य खेऽवस्थितमीशनिर्गमं

विवेश तस्मिन् मिषतां दिवौकसाम्॥ ३३

pīnāhibhogotthitamadbhutaṃ maha-

jjyotiḥ svadhāmnā jvalayad diśo daśa|

pratīkṣya khe'vasthitamīśanirgamaṃ

viveśa tasmin miṣatāṃ divaukasām|| 33

अर्थ

उस अजगरके स्थूल शरीरसे एक अत्यन्त अद्भुत और महान् ज्योति निकली, उस समय उस ज्योतिके प्रकाशसे दसों दिशाएँ प्रज्वलित हो उठीं। वह थोड़ी देरतक तो आकाशमें स्थित होकर भगवान्‌के निकलनेकी प्रतीक्षा करती रही। जब वे बाहर निकल आये, तब वह सब देवताओंके देखते-देखते उन्हींमें समा गयी॥ ३३॥✎ 1659

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1659 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ब्रह्म-लोकके → ब्रह्मलोकके

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