॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.12.33
पीनाहिभोगोत्थितमद्भुतं मह-
ज्ज्योतिः स्वधाम्ना ज्वलयद् दिशो दश।
प्रतीक्ष्य खेऽवस्थितमीशनिर्गमं
विवेश तस्मिन् मिषतां दिवौकसाम्॥ ३३
pīnāhibhogotthitamadbhutaṃ maha-
jjyotiḥ svadhāmnā jvalayad diśo daśa|
pratīkṣya khe'vasthitamīśanirgamaṃ
viveśa tasmin miṣatāṃ divaukasām|| 33
अर्थ
उस अजगरके स्थूल शरीरसे एक अत्यन्त अद्भुत और महान् ज्योति निकली, उस समय उस ज्योतिके प्रकाशसे दसों दिशाएँ प्रज्वलित हो उठीं। वह थोड़ी देरतक तो आकाशमें स्थित होकर भगवान्के निकलनेकी प्रतीक्षा करती रही। जब वे बाहर निकल आये, तब वह सब देवताओंके देखते-देखते उन्हींमें समा गयी॥ ३३॥✎ 1659