श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

ततोऽतिकायस्य निरुद्धमार्गिणो

ह्युद्गीर्णदृष्टेर्भ्रमतस्त्वितस्ततः ।

पूर्णोऽन्तरंगे पवनो निरुद्धो

मूर्धन् विनिष्पाट्य विनिर्गतो बहिः॥ ३१

tato'tikāyasya niruddhamārgiṇo

hyudgīrṇadṛṣṭerbhramatastvitastataḥ |

pūrṇo'ntaraṃge pavano niruddho

mūrdhan viniṣpāṭya vinirgato bahiḥ|| 31

अर्थ

इसके बाद भगवान्‌ने अपने शरीरको इतना बड़ा कर लिया कि उसका गला ही रुँध गया। आँखें उलट गयीं। वह व्याकुल होकर बहुत ही छटपटाने लगा। साँस रुककर सारे शरीरमें भर गयी और अन्तमें उसके प्राण ब्रह्मरन्ध्र फोड़कर निकल गये॥ ३१॥✎ 1659

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1659 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ब्रह्म-लोकके → ब्रह्मलोकके

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