॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.12.23
दावोष्णखरवातोऽयं श्वासवद् भाति पश्यत।
तद्दग्धसत्त्वदुर्गन्धोऽप्यन्तरामिषगन्धवत्॥ २३
dāvoṣṇakharavāto'yaṃ śvāsavad bhāti paśyata|
taddagdhasattvadurgandho'pyantarāmiṣagandhavat|| 23
अर्थ
किसी दूसरे ग्वालबालने कहा—‘देखो, देखो! ऐसा जान पड़ता है कि कहीं इधर जंगलमें आग लगी है। इसीसे यह गरम और तीखी हवा आ रही है। परन्तु अजगरकी साँसके साथ इसका क्या ही मेल बैठ गया है। और उसी आगसे जले हुए प्राणियोंकी दुर्गन्ध ऐसी जान पड़ती है, मानो अजगरके पेटमें मरे हुए जीवोंके मांसकी ही दुर्गन्ध हो’॥ २३॥