॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.12.21
प्रतिस्पर्धेते सृक्किभ्यां सव्यासव्ये नगोदरे।
तुंगशृंगालयोऽप्येतास्तद्दंष्ट्राभिश्च पश्यत॥ २१
pratispardhete sṛkkibhyāṃ savyāsavye nagodare|
tuṃgaśṛṃgālayo'pyetāstaddaṃṣṭrābhiśca paśyata|| 21
अर्थ
तीसरे ग्वालबालने कहा—‘हाँ, सच तो है। देखो तो सही, क्या ये दायीं और बायीं ओरकी गिरि-कन्दराएँ अजगरके जबड़ोंकी होड़ नहीं करतीं? और ये ऊँची-ऊँची शिखर-पंक्तियाँ तो साफ-साफ इसकी दाढ़ें मालूम पड़ती हैं’॥ २१॥