॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.12.19
अहो मित्राणि गदत सत्त्वकूटं पुरः स्थितम्।
अस्मत्संग्रसनव्यात्तव्यालतुण्डायते न वा॥ १९
aho mitrāṇi gadata sattvakūṭaṃ puraḥ sthitam|
asmatsaṃgrasanavyāttavyālatuṇḍāyate na vā|| 19
अर्थ
कोई कहता—‘मित्रो! भला बतलाओ तो, यह जो हमारे सामने कोई जीव-सा बैठा है, यह हमें निगलनेके लिये खुले हुए किसी अजगरके मुँह-जैसा नहीं है?’॥ १९॥