व्यात्ताजगरतुण्डेन ह्युत्प्रेक्षन्ते स्म लीलया॥ १८
dṛṣṭvā taṃ tādṛśaṃ sarve matvā vṛndāvanaśriyam|
vyāttājagaratuṇḍena hyutprekṣante sma līlayā|| 18
अर्थ
अघासुरका ऐसा रूप देखकर बालकोंने समझा कि यह भी वृन्दावनकी कोई शोभा है। वे कौतुकवश खेल-ही-खेलमें उत्प्रेक्षा करने लगे कि यह मानो अजगरका खुला हुआ मुँह है॥ १८॥
दृष्ट्वा तं तादृशं सर्वे मत्वा वृन्दावनश्रियम्।
व्यात्ताजगरतुण्डेन ह्युत्प्रेक्षन्ते स्म लीलया॥ १८
अघासुरका ऐसा रूप देखकर बालकोंने समझा कि यह भी वृन्दावनकी कोई शोभा है। वे कौतुकवश खेल-ही-खेलमें उत्प्रेक्षा करने लगे कि यह मानो अजगरका खुला हुआ मुँह है॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.12.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 206) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/12/18/