श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक दिन नन्दनन्दन श्यामसुन्दर वनमें ही कलेवा करनेके विचारसे बड़े तड़के उठ गये और सिंगी बाजेकी मधुर मनोहर ध्वनिसे अपने साथी ग्वालबालोंको मनकी बात जनाते हुए उन्हें जगाया और बछड़ोंको आगे करके वे व्रज-मण्डलसे निकल पड़े॥ १॥✎ 14141415
क्वचिद् वनाशाय मनो दधद् व्रजात्
प्रातः समुत्थाय वयस्यवत्सपान्।
प्रबोधयञ्छृंगरवेण चारुणा
विनिर्गतो वत्सपुरःसरो हरिः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक दिन नन्दनन्दन श्यामसुन्दर वनमें ही कलेवा करनेके विचारसे बड़े तड़के उठ गये और सिंगी बाजेकी मधुर मनोहर ध्वनिसे अपने साथी ग्वालबालोंको मनकी बात जनाते हुए उन्हें जगाया और बछड़ोंको आगे करके वे व्रज-मण्डलसे निकल पड़े॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.12.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 203) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/12/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)