श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

अथ द्वादशोऽध्यायः

अघासुरका उद्धार

श्रीशुक उवाच

क्वचिद् वनाशाय मनो दधद् व्रजात्

प्रातः समुत्थाय वयस्यवत्सपान्।

प्रबोधयञ्छृंगरवेण चारुणा

विनिर्गतो वत्सपुरःसरो हरिः॥ १

kvacid vanāśāya mano dadhad vrajāt

prātaḥ samutthāya vayasyavatsapān|

prabodhayañchṛṃgaraveṇa cāruṇā

vinirgato vatsapuraḥsaro hariḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक दिन नन्दनन्दन श्यामसुन्दर वनमें ही कलेवा करनेके विचारसे बड़े तड़के उठ गये और सिंगी बाजेकी मधुर मनोहर ध्वनिसे अपने साथी ग्वालबालोंको मनकी बात जनाते हुए उन्हें जगाया और बछड़ोंको आगे करके वे व्रज-मण्डलसे निकल पड़े॥ १॥✎ 1414 1415

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1414 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींका → छीका
  • #1415 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींके, → छीके,

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