श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.11.53

दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

मुक्तं बकास्यादुपलभ्य बालका

रामादयः प्राणमिवैन्द्रियो गणः।

स्थानागतं तं परिरभ्य निर्वृताः

प्रणीय वत्सान् व्रजमेत्य तज्जगुः॥ ५३

muktaṃ bakāsyādupalabhya bālakā

rāmādayaḥ prāṇamivaindriyo gaṇaḥ|

sthānāgataṃ taṃ parirabhya nirvṛtāḥ

praṇīya vatsān vrajametya tajjaguḥ|| 53

अर्थ

जब बलराम आदि बालकोंने देखा कि श्रीकृष्ण बगुलेके मुँहसे निकलकर हमारे पास आ गये हैं, तब उन्हें ऐसा आनन्द हुआ, मानो प्राणोंके संचारसे इन्द्रियाँ सचेत और आनन्दित हो गयी हों। सबने भगवान्‌को अलग-अलग गले लगाया। इसके बाद अपने-अपने बछड़े हाँककर सब व्रजमें आये और वहाँ उन्होंने घरके लोगोंसे सारी घटना कह सुनायी॥ ५३॥

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