॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.10.18
साधूनां समचित्तानां मुकुन्दचरणैषिणाम्।
उपेक्ष्यैः किं धनस्तम्भैरसद्भिरसदाश्रयैः॥ १८
sādhūnāṃ samacittānāṃ mukundacaraṇaiṣiṇām|
upekṣyaiḥ kiṃ dhanastambhairasadbhirasadāśrayaiḥ|| 18
अर्थ
जिन महात्माओंके चित्तमें सबके लिये समता है, जो केवल भगवान्के चरणारविन्दोंका मकरन्द-रस पीनेके लिये सदा उत्सुक रहते हैं, उन्हें दुर्गुणोंके खजाने अथवा दुराचारियोंकी जीविका चलानेवाले और धनके मदसे मतवाले दुष्टोंकी क्या आवश्यकता है? वे तो उनकी उपेक्षाके ही पात्र हैं†॥ १८॥
टिप्पणियाँ
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धन स्वयं एक दोष है। सातवें स्कन्धमें कहा है कि जितनेसे पेट भर जाय, उससे अधिकको अपना माननेवाला चोर है और दण्डका पात्र है—‘स स्तेनो दण्डमर्हति।’ भगवान् भी कहते हैं—जिसपर मैं अनुग्रह करता हूँ, उसका धन छीन लेता हूँ। इसीसे सत्पुरुष प्रायः धनियोंकी उपेक्षा करते हैं।