श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.10.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

दरिद्रस्यैव युज्यन्ते साधवः समदर्शिनः।

सद्भिः क्षिणोति तं तर्षं तत आराद् विशुद्ध्यति॥ १७

daridrasyaiva yujyante sādhavaḥ samadarśinaḥ|

sadbhiḥ kṣiṇoti taṃ tarṣaṃ tata ārād viśuddhyati|| 17

अर्थ

यद्यपि साधु पुरुष समदर्शी होते हैं, फिर भी उनका समागम दरिद्रके लिये ही सुलभ है; क्योंकि उसके भोग तो पहलेसे ही छूटे हुए हैं। अब संतोंके संगसे उसकी लालसा-तृष्णा भी मिट जाती है और शीघ्र ही उसका अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है*॥ १७॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    धनी पुरुषमें तीन दोष होते हैं—धन, धनका अभिमान और धनकी तृष्णा। दरिद्र पुरुषमें पहले दो नहीं होते, केवल तीसरा ही दोष रहता है। इसलिये सत्पुरुषोंके संगसे धनकी तृष्णा मिट जानेपर धनियोंकी अपेक्षा उसका शीघ्र कल्याण हो जाता है।

    (मुद्रित पृष्ठ 192)

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