॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.10.11
देहः किमन्नदातुः स्वं निषेक्तुर्मातुरेव च।
मातुः पितुर्वा बलिनः क्रेतुरग्नेः शुनोऽपि वा॥ ११
dehaḥ kimannadātuḥ svaṃ niṣekturmātureva ca|
mātuḥ piturvā balinaḥ kreturagneḥ śuno'pi vā|| 11
अर्थ
बतलाओ तो सही, यह शरीर किसकी सम्पत्ति है? अन्न देकर पालनेवालेकी है या गर्भाधान करानेवाले पिताकी? यह शरीर उसे नौ महीने पेटमें रखनेवाली माताका है अथवा माताको भी पैदा करनेवाले नानाका? जो बलवान् पुरुष बलपूर्वक इससे काम करा लेता है, उसका है अथवा दाम देकर खरीद लेनेवालेका? चिताकी जिस धधकती आगमें यह जल जायगा, उसका है अथवा जो कुत्ते-स्यार इसको चीथ-चीथकर खा जानेकी आशा लगाये बैठे हैं, उनका?॥ ११॥