श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

निर्बन्धं तस्य तं ज्ञात्वा विचिन्त्यानकदुन्दुभिः।

प्राप्तं कालं प्रतिव्योढुमिदं तत्रान्वपद्यत॥ ४७

nirbandhaṃ tasya taṃ jñātvā vicintyānakadundubhiḥ|

prāptaṃ kālaṃ prativyoḍhumidaṃ tatrānvapadyata|| 47

अर्थ

वसुदेवजीने कंसका विकट हठ देखकर यह विचार किया कि किसी प्रकार यह समय तो टाल ही देना चाहिये। तब वे इस निश्‍चयपर पहुँचे॥ ४७॥

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