जब शरीरका अन्त हो जाता है, तब जीव अपने कर्मके अनुसार दूसरे शरीरको ग्रहण करके अपने पहले शरीरको छोड़ देता है। उसे विवश होकर ऐसा करना पड़ता है॥ ३९॥
देहे पंचत्वमापन्ने देही कर्मानुगोऽवशः।
देहान्तरमनुप्राप्य प्राक्तनं त्यजते वपुः॥ ३९
जब शरीरका अन्त हो जाता है, तब जीव अपने कर्मके अनुसार दूसरे शरीरको ग्रहण करके अपने पहले शरीरको छोड़ देता है। उसे विवश होकर ऐसा करना पड़ता है॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 124) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/39/