श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.37

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

वसुदेव उवाच

श्‍लाघनीयगुणः शूरैर्भवान् भोजयशस्करः।

स कथं भगिनीं हन्यात् स्त्रियमुद्वाहपर्वणि॥ ३७

ślāghanīyaguṇaḥ śūrairbhavān bhojayaśaskaraḥ|

sa kathaṃ bhaginīṃ hanyāt striyamudvāhaparvaṇi|| 37

अर्थ

वसुदेवजीने कहा—राजकुमार! आप भोजवंशके होनहार वंशधर तथा अपने कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले हैं। बड़े-बड़े शूरवीर आपके गुणोंकी सराहना करते हैं। इधर यह एक तो स्त्री, दूसरे आपकी बहिन और तीसरे यह विवाहका शुभ अवसर! ऐसी स्थितिमें आप इसे कैसे मार सकते हैं?॥ ३७॥

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