॥ श्रीहरिः ॥
सम्पद्यमानमाज्ञाय भीष्मं ब्रह्मणि निष्कले।
सर्वे बभूवुस्ते तूष्णीं वयांसीव दिनात्यये२॥ ४४
sampadyamānamājñāya bhīṣmaṃ brahmaṇi niṣkale|
sarve babhūvuste tūṣṇīṃ vayāṃsīva dinātyaye|| 44
अर्थ
उन्हें अनन्त ब्रह्ममें लीन जानकर सब लोग वैसे ही चुप हो गये, जैसे दिनके बीत जानेपर पक्षियोंका कलरव शान्त हो जाता है॥ ४४॥✎ 74
सम्पद्यमानमाज्ञाय भीष्मं ब्रह्मणि निष्कले।
सर्वे बभूवुस्ते तूष्णीं वयांसीव दिनात्यये॥ ४४
उन्हें अनन्त ब्रह्ममें लीन जानकर सब लोग वैसे ही चुप हो गये, जैसे दिनके बीत जानेपर पक्षियोंका कलरव शान्त हो जाता है॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.9.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 124) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/9/44/टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—दिवात्यये।
(मुद्रित पृष्ठ 124)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #74 शब्दोंके बीचका स्थान: ४५॥शौनकजी! → ४५॥ शौनकजी!