श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.43

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

सूत उवाच

कृष्ण एवं भगवति मनोवाग्दृष्टिवृत्तिभिः१।

आत्मन्यात्मानमावेश्य सोऽन्तःश्वास उपारमत्॥ ४३

kṛṣṇa evaṃ bhagavati manovāgdṛṣṭivṛttibhiḥ|

ātmanyātmānamāveśya so'ntaḥśvāsa upāramat|| 43

अर्थ

सूतजी कहते हैं—इस प्रकार भीष्मपितामहने मन, वाणी और दृष्टिकी वृत्तियोंसे आत्मस्वरूप भगवान् श्रीकृष्णमें अपने-आपको लीन कर दिया। उनके प्राण वहीं विलीन हो गये और वे शान्त हो गये॥ ४३॥✎ 74

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—मनोवाग्वृत्तिदृष्टिभिः।

    (मुद्रित पृष्ठ 124)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #74 शब्दोंके बीचका स्थान: ४५॥शौनकजी! → ४५॥ शौनकजी!

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