श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.15

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यत्र धर्मसुतो राजा गदापाणिर्वृकोदरः।

कृष्णोऽस्त्री गाण्डिवं चापं सुहृत्कृष्णस्ततो विपत्॥ १५

yatra dharmasuto rājā gadāpāṇirvṛkodaraḥ|

kṛṣṇo'strī gāṇḍivaṃ cāpaṃ suhṛtkṛṣṇastato vipat|| 15

अर्थ

नहीं तो जहाँ साक्षात् धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर हों, गदाधारी भीमसेन और धनुर्धारी अर्जुन रक्षाका काम कर रहे हों, गाण्डीव धनुष हो और स्वयं श्रीकृष्ण सुहृद‍् हों—भला, वहाँ भी विपत्तिकी सम्भावना है?॥ १५॥✎ 1575

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1575 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भीष्म-पितामहके → भीष्मपितामहके

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