उत्तराने कहा—देवाधिदेव! जगदीश्वर! आप महायोगी हैं। आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपके अतिरिक्त इस लोकमें मुझे अभय देनेवाला और कोई नहीं है; क्योंकि यहाँ सभी परस्पर एक-दूसरेकी मृत्युके निमित्त बन रहे हैं॥ ९॥✎ 1914
पाहि पाहि महायोगिन्देवदेव जगत्पते।
नान्यं त्वदभयं पश्ये यत्र मृत्युः परस्परम्॥ ९
उत्तराने कहा—देवाधिदेव! जगदीश्वर! आप महायोगी हैं। आप मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपके अतिरिक्त इस लोकमें मुझे अभय देनेवाला और कोई नहीं है; क्योंकि यहाँ सभी परस्पर एक-दूसरेकी मृत्युके निमित्त बन रहे हैं॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.8.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 114) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/8/9/
टिप्पणियाँ
१
प्रा० पा०—नान्यत्र त्वभयं।
(मुद्रित पृष्ठ 114)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1914 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सर्व-शक्तिमान् → सर्वशक्तिमान्