श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.4

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

सान्त्वयामास मुनिभिर्हतबन्धूञ्छुचार्पितान्२।

भूतेषु कालस्य गतिं दर्शयन्‍नप्रतिक्रियाम्॥ ४

sāntvayāmāsa munibhirhatabandhūñchucārpitān|

bhūteṣu kālasya gatiṃ darśayannapratikriyām|| 4

अर्थ

वहाँ अपने भाइयोंके साथ कुरुपति महाराज युधिष्ठिर, धृतराष्ट्र, पुत्रशोकसे व्याकुल गान्धारी, कुन्ती और द्रौपदी—सब बैठकर मरे हुए स्वजनोंके लिये शोक करने लगे। भगवान् श्रीकृष्णने धौम्यादि मुनियोंके साथ उनको सान्त्वना दी और समझाया कि संसारके सभी प्राणी कालके अधीन हैं, मौतसे किसीको कोई बचा नहीं सकता॥ ३-४॥

यह अर्थ श्लोक 3–4 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—शुचार्दितान्।

    (मुद्रित पृष्ठ 113)

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