श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.35

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

भवेऽस्मिन् क्लिश्यमानानामविद्याकामकर्मभिः।

श्रवणस्मरणार्हाणि करि१ष्यन्‍निति केचन॥ ३५

bhave'smin kliśyamānānāmavidyākāmakarmabhiḥ|

śravaṇasmaraṇārhāṇi kariṣyanniti kecana|| 35

अर्थ

कोई महापुरुष यों कहते हैं कि जो लोग इस संसारमें अज्ञान, कामना और कर्मोंके बन्धनमें जकड़े हुए पीड़ित हो रहे हैं उन लोगोंके लिये श्रवण और स्मरण करनेयोग्य लीला करनेके विचारसे ही आपने अवतार ग्रहण किया है॥ ३५॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—करिष्य इति।

    (मुद्रित पृष्ठ 117)

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