श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.33

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

अपरे वसुदेवस्य देवक्यां याचितोऽभ्यगात्।

अजस्त्वमस्य क्षेमाय वधाय च सुरद्विषाम्॥ ३३

apare vasudevasya devakyāṃ yācito'bhyagāt|

ajastvamasya kṣemāya vadhāya ca suradviṣām|| 33

अर्थ

दूसरे लोग यों कहते हैं कि वसुदेव और देवकीने पूर्वजन्ममें (सुतपा और पृश्निके रूपमें) आपसे यही वरदान प्राप्त किया था, इसीलिये आप अजन्मा होते हुए भी जगत‍्के कल्याण और दैत्योंके नाशके लिये उनके पुत्र बने हैं॥ ३३॥

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