श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.30

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

जन्म कर्म च विश्वात्मन्‍नजस्याकर्तुरात्मनः।

तिर्यङ्नॄषिषु१ यादःसु तदत्यन्तविडम्बनम्॥ ३०✎ 988

janma karma ca viśvātmannajasyākarturātmanaḥ|

tiryaṅnṝṣiṣu yādaḥsu tadatyantaviḍambanam|| 30

अर्थ

आप विश्‍वके आत्मा हैं, विश्‍वरूप हैं। न आप जन्म लेते हैं और न कर्म ही करते हैं। फिर भी पशु-पक्षी, मनुष्य, ऋषि, जलचर आदिमें आप जन्म लेते हैं और उन योनियोंके अनुरूप दिव्य कर्म भी करते हैं। यह आपकी लीला ही तो है॥ ३०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—नृष्वपि यादस्सु।

    (मुद्रित पृष्ठ 116)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #988 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): तिर्यङ्नृषिषु → तिर्यङ्नॄषिषु

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