श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.5

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

यया सम्मोहितो जीव आत्मानं त्रिगुणात्मकम्।

परोऽपि मनुतेऽनर्थं तत्कृतं चाभिपद्यते॥ ५

yayā sammohito jīva ātmānaṃ triguṇātmakam|

paro'pi manute'narthaṃ tatkṛtaṃ cābhipadyate|| 5

अर्थ

इसी मायासे मोहित होकर यह जीव तीनों गुणोंसे अतीत होनेपर भी अपनेको त्रिगुणात्मक मान लेता है और इस मान्यताके कारण होनेवाले अनर्थोंको भोगता है॥ ५॥✎ 1573

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1573 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भक्ति-योग। → भक्तियोग।

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