वहीं व्यासजीका अपना आश्रम है। उसके चारों ओर बेरका सुन्दर वन है। उस आश्रममें बैठकर उन्होंने आचमन किया और स्वयं अपने मनको समाहित किया॥ ३॥✎ 1573
तस्मिन् स्व आश्रमे व्यासो बदरीषण्डमण्डिते।
आसीनोऽप उपस्पृश्य प्रणिदध्यौ मनः स्वयम्॥ ३
वहीं व्यासजीका अपना आश्रम है। उसके चारों ओर बेरका सुन्दर वन है। उस आश्रममें बैठकर उन्होंने आचमन किया और स्वयं अपने मनको समाहित किया॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.7.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 107) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/7/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)