श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.28

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

न ह्यस्यान्यतमं किञ्चिदस्त्रं प्रत्यवकर्शनम्।

जह्यस्त्रतेज उन्‍नद्धमस्त्रज्ञो ह्यस्त्रतेजसा॥ २८

na hyasyānyatamaṃ kiñcidastraṃ pratyavakarśanam|

jahyastrateja unnaddhamastrajño hyastratejasā|| 28

अर्थ

किसी भी दूसरे अस्त्रमें इसको दबा देनेकी शक्ति नहीं है। तुम शस्त्रास्त्रविद्याको भलीभाँति जानते ही हो, ब्रह्मास्त्रके तेजसे ही इस ब्रह्मास्त्रकी प्रचण्ड आगको बुझा दो॥ २८॥✎ 65

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #65 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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