॥ श्रीहरिः ॥
तथायं चावतारस्ते भुवो भारजिहीर्षया।
२स्वानां चानन्यभावानामनुध्यानाय चासकृत्॥ २५✎ 2244
tathāyaṃ cāvatāraste bhuvo bhārajihīrṣayā|
svānāṃ cānanyabhāvānāmanudhyānāya cāsakṛt|| 25
अर्थ
तुम्हारा यह अवतार पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये और तुम्हारे अनन्य प्रेमी भक्तजनोंके निरन्तर स्मरण-ध्यान करनेके लिये है॥ २५॥
तथायं चावतारस्ते भुवो भारजिहीर्षया।
स्वानां चानन्यभावानामनुध्यानाय चासकृत्॥ २५
तुम्हारा यह अवतार पृथ्वीका भार हरण करनेके लिये और तुम्हारे अनन्य प्रेमी भक्तजनोंके निरन्तर स्मरण-ध्यान करनेके लिये है॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.7.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 109) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/7/25/टिप्पणियाँ
- २
प्रा० पा०—स्वानामनन्य०।
(मुद्रित पृष्ठ 109)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #2244 टिप्पणी-चिह्नका स्थान: स्वा|नां → |स्वानां