श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.14

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

भर्तुः प्रियं द्रौणिरिति स्म पश्यन् कृष्णासुतानां स्वपतां शिरांसि।

उपाहरद् विप्रियमेव तस्य जुगुप्सितं कर्म विगर्हयन्ति॥ १४

bhartuḥ priyaṃ drauṇiriti sma paśyan kṛṣṇāsutānāṃ svapatāṃ śirāṃsi|

upāharad vipriyameva tasya jugupsitaṃ karma vigarhayanti|| 14

अर्थ

जिस समय महाभारतयुद्धमें कौरव और पाण्डव दोनों पक्षोंके बहुत-से वीर वीरगतिको प्राप्त हो चुके थे और भीमसेनकी गदाके प्रहारसे दुर्योधनकी जाँघ टूट चुकी थी, तब अश्‍वत्थामाने अपने स्वामी दुर्योधनका प्रिय कार्य समझकर द्रौपदीके सोते हुए पुत्रोंके सिर काटकर उसे भेंट किये, यह घटना दुर्योधनको भी अप्रिय ही लगी; क्योंकि ऐसे नीच कर्मकी सभी निन्दा करते हैं॥ १३-१४॥

यह अर्थ श्लोक 13–14 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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