जब मैं उनकी लीलाओंका गान करने लगता हूँ, तब वे प्रभु, जिनके चरणकमल समस्त तीर्थोंके उद्गमस्थान हैं और जिनका यशोगान मुझे बहुत ही प्रिय लगता है, बुलाये हुएकी भाँति तुरन्त मेरे हृदयमें आकर दर्शन दे देते हैं॥ ३४॥✎ 5859606112801281
प्रगायतः स्ववीर्याणि तीर्थपादः प्रियश्रवाः।
आहूत इव मे शीघ्रं दर्शनं याति चेतसि॥ ३४
जब मैं उनकी लीलाओंका गान करने लगता हूँ, तब वे प्रभु, जिनके चरणकमल समस्त तीर्थोंके उद्गमस्थान हैं और जिनका यशोगान मुझे बहुत ही प्रिय लगता है, बुलाये हुएकी भाँति तुरन्त मेरे हृदयमें आकर दर्शन दे देते हैं॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.6.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 106) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/6/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)