श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.34

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

प्रगायतः स्ववीर्याणि तीर्थपादः प्रियश्रवाः।

आहूत इव मे शीघ्रं दर्शनं याति चेतसि॥ ३४

pragāyataḥ svavīryāṇi tīrthapādaḥ priyaśravāḥ|

āhūta iva me śīghraṃ darśanaṃ yāti cetasi|| 34

अर्थ

जब मैं उनकी लीलाओंका गान करने लगता हूँ, तब वे प्रभु, जिनके चरणकमल समस्त तीर्थोंके उद्गमस्थान हैं और जिनका यशोगान मुझे बहुत ही प्रिय लगता है, बुलाये हुएकी भाँति तुरन्त मेरे हृदयमें आकर दर्शन दे देते हैं॥ ३४॥✎ 58 59 60 61 1280 1281

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #58 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #59 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #60 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #61 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1280 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: (प्रलय-कालीन → (प्रलयकालीन
  • #1281 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पांच-भौतिक → पांचभौतिक

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