श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.6.26

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

एतावदुक्त्वोपरराम तन्महद्

भूतं नभोलिङ्गमलिङ्गमीश्‍वरम्।

अहं च तस्मै महतां महीयसे

शीर्ष्णावनामं विदधेऽनुकम्पितः॥ २६

etāvaduktvopararāma tanmahad

bhūtaṃ nabholiṅgamaliṅgamīśvaram|

ahaṃ ca tasmai mahatāṃ mahīyase

śīrṣṇāvanāmaṃ vidadhe'nukampitaḥ|| 26

अर्थ

आकाशके समान अव्यक्त सर्वशक्तिमान् महान् परमात्मा इतना कहकर चुप हो रहे। उनकी इस कृपाका अनुभव करके मैंने उन श्रेष्ठोंसे भी श्रेष्ठतर भगवान्‌को सिर झुकाकर प्रणाम किया॥ २६॥✎ 55 56 57

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #55 शब्दोंके बीचका स्थान: कोसिर → को सिर
  • #56 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #57 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने, → भगवान्‌ने,

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें