॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.5.12
नैष्कर्म्यमप्यच्युतभाववर्जितं
न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम्।
कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरे
न चार्पितं कर्म यदप्यकारणम्॥ १२
naiṣkarmyamapyacyutabhāvavarjitaṃ
na śobhate jñānamalaṃ nirañjanam|
kutaḥ punaḥ śaśvadabhadramīśvare
na cārpitaṃ karma yadapyakāraṇam|| 12
अर्थ
वह निर्मल ज्ञान भी, जो मोक्षकी प्राप्तिका साक्षात् साधन है, यदि भगवान्की भक्तिसे रहित हो तो उसकी उतनी शोभा नहीं होती। फिर जो साधन और सिद्धि दोनों ही दशाओंमें सदा ही अमंगलरूप है, वह काम्य कर्म और जो भगवान्को अर्पण नहीं किया गया है, ऐसा अहैतुक (निष्काम) कर्म भी कैसे सुशोभित हो सकता है॥ १२॥✎ 40 41 42 43 44 45 46 1571 1572