श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.5.11

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

तद्वाग्विसर्गो जनताघविप्लवो

यस्मिन् प्रतिश्लोकमबद्धवत्यपि।

नामान्यनन्तस्य यशोऽङ्कितानि य-

च्छृण्वन्ति गायन्ति गृणन्ति साधवः॥ ११

tadvāgvisargo janatāghaviplavo

yasmin pratiślokamabaddhavatyapi|

nāmānyanantasya yaśo'ṅkitāni ya-

cchṛṇvanti gāyanti gṛṇanti sādhavaḥ|| 11

अर्थ

इसके विपरीत जिसमें सुन्दर रचना भी नहीं है और जो दूषित शब्दोंसे युक्त भी है, परन्तु जिसका प्रत्येक श्लोक भगवान्‌के सुयशसूचक नामोंसे युक्त है, वह वाणी लोगोंके सारे पापोंका नाश कर देती है; क्योंकि सत्पुरुष ऐसी ही वाणीका श्रवण, गान और कीर्तन किया करते हैं॥ ११॥✎ 40 41 42 43 44 45 46 1571 1572

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (9)
  • #40 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #41 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #42 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #43 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #44 शब्दोंके बीचका स्थान: कोअर्पण → को अर्पण
  • #45 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #46 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1571 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पुरुषोत्तम-भगवान्‌के → पुरुषोत्तमभगवान्‌के
  • #1572 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अचिन्त्य-शक्ति → अचिन्त्यशक्ति

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