श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.4.30

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

तथापि बत मे दैह्यो ह्यात्मा चैवात्मना विभुः।

असम्पन्‍न इवाभाति ब्रह्मवर्चस्यसत्तमः॥ ३०

tathāpi bata me daihyo hyātmā caivātmanā vibhuḥ|

asampanna ivābhāti brahmavarcasyasattamaḥ|| 30

अर्थ

यद्यपि मैं ब्रह्मतेजसे सम्पन्‍न एवं समर्थ हूँ, तथापि मेरा हृदय कुछ अपूर्णकाम-सा जान पड़ता है॥ ३०॥✎ 36 37 38 39

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #36 शब्दोंके बीचका स्थान: कोभी → को भी
  • #37 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #38 शब्दोंके बीचका स्थान: कोप्राप्त → को प्राप्त
  • #39 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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