श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.4.19

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

चातुर्होत्रं कर्म शुद्धं प्रजानां वीक्ष्य वैदिकम्।

व्यदधाद्यज्ञसन्तत्यै वेदमेकं चतुर्विधम्॥ १९

cāturhotraṃ karma śuddhaṃ prajānāṃ vīkṣya vaidikam|

vyadadhādyajñasantatyai vedamekaṃ caturvidham|| 19

अर्थ

उन्होंने सोचा कि वेदोक्त चातुर्होत्र* कर्म लोगोंका हृदय शुद्ध करनेवाला है। इस दृष्टिसे यज्ञोंका विस्तार करनेके लिये उन्होंने एक ही वेदके चार विभाग कर दिये॥ १९॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    होता, अध्वर्यु, उद्गाता और ब्रह्मा—ये चार होता हैं। इनके द्वारा सम्पादित होनेवाले अग्‍निष्टोमादि यज्ञको चातुर्होत्र कहते हैं।

    (मुद्रित पृष्ठ 95)

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