प्राकृत स्वरूपरहित चिन्मय भगवान्का जो यह स्थूल जगदाकार रूप है, यह उनकी मायाके महत्तत्त्वादि गुणोंसे भगवान्में ही कल्पित है॥ ३०॥✎ 32
एतद्रूपं भगवतो ह्यरूपस्य चिदात्मनः।
मायागुणैर्विरचितं महदादिभिरात्मनि॥ ३०
प्राकृत स्वरूपरहित चिन्मय भगवान्का जो यह स्थूल जगदाकार रूप है, यह उनकी मायाके महत्तत्त्वादि गुणोंसे भगवान्में ही कल्पित है॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.3.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 91) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/3/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)