श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.3.15

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 3 · अथ तृतीयोऽध्यायः

रूपं स जगृहे मात्स्यं चाक्षुषोदधिसम्प्लवे।

नाव्यारोप्य महीमय्यामपाद्वैवस्वतं मनुम्॥ १५

rūpaṃ sa jagṛhe mātsyaṃ cākṣuṣodadhisamplave|

nāvyāropya mahīmayyāmapādvaivasvataṃ manum|| 15

अर्थ

चाक्षुष मन्वन्तरके अन्तमें जब सारी त्रिलोकी समुद्रमें डूब रही थी, तब उन्होंने मत्स्यके रूपमें दसवाँ अवतार ग्रहण किया और पृथ्वीरूपी नौकापर बैठाकर अगले मन्वन्तरके अधिपति वैवस्वत मनुकी रक्षा की॥ १५॥✎ 30 31

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #30 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने
  • #31 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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