श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.25

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

भेजिरे मुनयोऽथाग्रे भगवन्तमधोक्षजम्।

सत्त्वं विशुद्धं क्षेमाय कल्पन्ते येऽनु तानिह॥ २५

bhejire munayo'thāgre bhagavantamadhokṣajam|

sattvaṃ viśuddhaṃ kṣemāya kalpante ye'nu tāniha|| 25

अर्थ

प्राचीन युगमें महात्मालोग अपने कल्याणके लिये विशुद्ध सत्त्वमय भगवान् विष्णुकी ही आराधना किया करते थे। अब भी जो लोग उनका अनुसरण करते हैं, वे उन्हींके समान कल्याणभाजन होते हैं॥ २५॥

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