श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.18

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

नष्टप्रायेष्वभद्रेषु नित्यं भागवतसेवया२।

भगवत्युत्तमश्लोके भक्तिर्भवति नैष्ठिकी॥ १८

naṣṭaprāyeṣvabhadreṣu nityaṃ bhāgavatasevayā|

bhagavatyuttamaśloke bhaktirbhavati naiṣṭhikī|| 18

अर्थ

जब श्रीमद्भागवत अथवा भगवद्भक्तोंके निरन्तर सेवनसे अशुभ वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं, तब पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके प्रति स्थायी प्रेमकी प्राप्ति होती है॥ १८॥✎ 27

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—भगवदाश्रयात्।

    (मुद्रित पृष्ठ 86)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #27 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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