श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.2.17

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

शृण्वतां स्वकथां कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः।

हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम्॥ १७

śṛṇvatāṃ svakathāṃ kṛṣṇaḥ puṇyaśravaṇakīrtanaḥ|

hṛdyantaḥstho hyabhadrāṇi vidhunoti suhṛtsatām|| 17

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णके यशका श्रवण और कीर्तन दोनों पवित्र करनेवाले हैं। वे अपनी कथा सुननेवालोंके हृदयमें आकर स्थित हो जाते हैं और उनकी अशुभ वासनाओंको नष्ट कर देते हैं; क्योंकि वे संतोंके नित्य सुहृद‍् हैं॥ १७॥✎ 27

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #27 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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