श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.20

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

न वा इदं राजर्षिवर्य चित्रं

भवत्सु कृष्णं समनुव्रतेषु।

येऽध्यासनं राजकिरीटजुष्टं

सद्यो जहुर्भगवत्पार्श्वकामाः॥ २०

na vā idaṃ rājarṣivarya citraṃ

bhavatsu kṛṣṇaṃ samanuvrateṣu|

ye'dhyāsanaṃ rājakirīṭajuṣṭaṃ

sadyo jahurbhagavatpārśvakāmāḥ|| 20

अर्थ

‘राजर्षिशिरोमणे! भगवान् श्रीकृष्णके सेवक और अनुयायी आप पाण्डुवंशियोंके लिये यह कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि आपलोगोंने भगवान्‌की सन्‍निधि प्राप्त करनेकी आकांक्षासे उस राजसिंहासनका एक क्षणमें ही परित्याग कर दिया, जिसकी सेवा बड़े-बड़े राजा अपने मुकुटोंसे करते थे॥ २०॥✎ 114

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #114 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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