श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.19.17

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

इति स्म राजाध्यवसाययुक्तः

प्राचीनमूलेषु कुशेषु धीरः।

उदङ्मुखो दक्षिणकूल आस्ते

समुद्रपत्न्याः स्वसुतन्यस्तभारः॥ १७

iti sma rājādhyavasāyayuktaḥ

prācīnamūleṣu kuśeṣu dhīraḥ|

udaṅmukho dakṣiṇakūla āste

samudrapatnyāḥ svasutanyastabhāraḥ|| 17

अर्थ

महाराज परीक्षित् परम धीर थे। वे ऐसा दृढ़ निश्‍चय करके गंगाजीके दक्षिण तटपर पूर्वाग्र कुशोंके आसनपर उत्तरमुख होकर बैठ गये। राज-काजका भार तो उन्होंने पहले ही अपने पुत्र जनमेजयको सौंप दिया था॥ १७॥

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